रामनगर की रामलीला: 200 साल पुरानी वो परंपरा, जहां पूरा शहर बन जाता है रामकथा का मंच

वाराणसी की रामनगर रामलीला की शुरुआत, इतिहास, परंपरा और खासियत जानिए। कैसे करीब 200 साल से पूरा रामनगर रामकथा का जीवंत मंच बन जाता है, पढ़िए पूरी कहानी।

 

यहां पूरा रामनगर रामकथा का मंच बन जाता है और अयोध्या, जनकपुर, पंचवटी से लेकर लंका तक के प्रसंग अलग-अलग स्थानों पर जीवंत होते हैं। जानिए इस अनोखी परंपरा की पूरी कहानी।

 

 

वाराणसी। वाराणसी में गंगा के उस पार एक ऐसा शहर है, जहां रामलीला सिर्फ मंच पर नहीं होती, बल्कि पूरा शहर ही रामकथा का हिस्सा बन जाता है। कहीं अयोध्या दिखाई देती है, कहीं जनकपुर, कहीं पंचवटी तो कहीं लंका। हजारों लोग हर साल इन स्थलों तक पहुंचते हैं और घंटों तक चलने वाली इस लीला के साक्षी बनते हैं। यह है रामनगर की प्रसिद्ध रामलीला, जिसकी परंपरा करीब दो सदियों से चली आ रही है। लेकिन क्या आपको पता है कि रामनगर की रामलीला की शुरुआत कब और कैसे हुई? आखिर ऐसी क्या खासियत है कि यह रामलीला देश ही नहीं, बल्कि दुनिया भर में अपनी अलग पहचान बना चुकी है? आइए, जानते हैं इसकी कहानी... 

उन्नीसवीं सदी की शुरुआत से जुड़ी है कहानी

रामनगर की रामलीला की शुरुआत को लेकर कई लोककथाएं और किंवदंतियां सुनने को मिलती हैं। हालांकि उपलब्ध ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार इसकी शुरुआत काशीराज उदित नारायण सिंह के शासनकाल में मानी जाती है। उनका शासन 1796 से 1835 तक रहा। इसी आधार पर रामनगर की रामलीला की शुरुआत को उन्नीसवीं सदी के प्रारंभ से जोड़ा जाता है।

शुरुआती दौर में रामलीला का आयोजन रामनगर किले के भीतर और उसके आसपास के मैदानों में होता था। धीरे-धीरे इसका स्वरूप इतना विस्तृत होता गया कि रामकथा के अलग-अलग प्रसंगों के लिए अलग-अलग स्थान निर्धारित किए गए।

यानी यहां रामलीला देखने के लिए आपको एक जगह बैठकर पूरा मंचन देखने के बजाय रामकथा के साथ-साथ अलग-अलग स्थानों तक जाना पड़ता है।

 

 

न तेज रोशनी, न बड़े साउंड सिस्टम... फिर भी हजारों की भीड़

आज जब बड़े आयोजनों में हजारों वॉट की लाइट, बड़े स्पीकर और आधुनिक मंच आम बात हैं, वहीं रामनगर की रामलीला अपनी पुरानी परंपरा को आज भी काफी हद तक उसी रूप में निभाती है।

कई प्रसंगों में पंचलाइट और मशालों की रोशनी दिखाई देती है। रामायण के संवाद और प्रसंगों का मंचन पारंपरिक तरीके से किया जाता है। कहा जाता है कि बड़ी भीड़ के बीच भी रामलीला के व्यास की आवाज "चुप रहो! सावधान!" अनुशासन बनाए रखने के लिए काफी होती है। यही सादगी इस रामलीला को बाकी आयोजनों से अलग पहचान देती है।

 

 

जब पूरा रामनगर बन जाता है रामकथा का मंच

रामनगर की रामलीला की सबसे खास बात इसका विशाल और चलायमान मंच है। लगभग 10 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में अलग-अलग प्रसंगों के लिए स्थान निर्धारित किए गए हैं।

अयोध्या, जनकपुर, पंचवटी, चित्रकूट, लंका, अशोक वाटिका, निषादराज आश्रम और पंपासर जैसे नाम आज भी इन स्थानों की पहचान का हिस्सा हैं। कल्पना कीजिए-एक तरफ हजारों श्रद्धालुओं की भीड़ है, दूसरी तरफ रामकथा का प्रसंग चल रहा है और दर्शक उस प्रसंग के साथ अगले स्थान की ओर बढ़ रहे हैं। यही अनुभव रामनगर की रामलीला को बाकी रामलीलाओं से अलग बनाता है।

 

 

रामचरितमानस के अनुसार होता है मंचन

रामनगर की रामलीला का मंचन संत तुलसीदास द्वारा रचित रामचरितमानस के आधार पर किया जाता है। रामायणी दल नारदी वाणी में प्रसंगानुसार गायन करता है और उसके बाद संबंधित प्रसंग का मंचन संवादों के साथ होता है।इस पूरी प्रक्रिया में सिर्फ कलाकार ही महत्वपूर्ण नहीं होते। व्यास, रामायणी दल, साधु-संत, नेमीजन और पर्दे के पीछे काम करने वाले लोग भी इस परंपरा का अहम हिस्सा हैं। कई परिवार पीढ़ियों से इस रामलीला से जुड़े हुए हैं और बिना प्रसिद्धि या बड़े पारिश्रमिक की अपेक्षा के अपनी भूमिका निभाते आ रहे हैं।

 

महाराज ईश्वरी नारायण सिंह के समय मिला व्यवस्थित स्वरूप

रामलीला को व्यवस्थित रूप देने में काशीराज ईश्वरी नारायण सिंह के समय महत्वपूर्ण काम हुआ। रामलीला के संवाद, लीला स्थलों और मंचन को लेकर शोध और व्यवस्था की गई। इस कार्य में संत काष्ठ जिह्वा स्वामी, भारतेंदु हरिश्चंद्र और रीवा नरेश रघुराज सिंह जैसे विद्वानों के योगदान का भी उल्लेख मिलता है। रामलीला के अभिनय के लिए काष्ठ जिह्वा स्वामी द्वारा तैयार की गई हस्तलिखित पुस्तिका आज भी रामनगर दुर्ग में सुरक्षित बताई जाती है। इसी परंपरा और सामग्री के आधार पर वर्तमान व्यास-गण लीला के निर्देशन की परंपरा निभाते हैं।

1825 की तस्वीर भी देती है पुराने वैभव की झलक

रामनगर की रामलीला कितनी पुरानी और भव्य रही है, इसका एक महत्वपूर्ण उल्लेख 1825 से मिलता है। बनारस में पदस्थापित अंग्रेज अधिकारी जेम्स प्रिंसप ने रामनगर की रामलीला से संबंधित एक चित्र बनाया था। इस चित्र में राम-रावण युद्ध के प्रसंग को दिखाया गया था। यह चित्र उनकी पुस्तक Benares Illustrated: In a Series of Drawings में प्रकाशित हुआ था। इतिहास के इस दस्तावेज से अंदाजा लगाया जा सकता है कि 19वीं सदी के शुरुआती दौर में ही रामनगर की रामलीला ने एक बड़े और विस्तृत आयोजन का स्वरूप ले लिया था।

एक महीने तक चलता है रामकथा का यह महाआयोजन

रामनगर की रामलीला की औपचारिक शुरुआत भाद्रपद शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी यानी अनंत चतुर्दशी से मानी जाती है। हालांकि इसकी तैयारी कई महीने पहले शुरू हो जाती है।

पात्रों का चयन और प्रशिक्षण, वस्त्रों और मुखौटों की तैयारी, उपकरणों की व्यवस्था, गणेश पूजन और अन्य धार्मिक प्रक्रियाएं इस आयोजन का हिस्सा होती हैं।

एक महीने तक चलने वाली इस रामलीला में हर दिन अलग प्रसंग और अलग स्थान के साथ दर्शकों का जुड़ाव बना रहता है।

यहां दर्शक सिर्फ दर्शक नहीं रहता

शायद रामनगर की रामलीला की सबसे खूबसूरत बात यही है कि यहां आने वाला व्यक्ति केवल सामने बैठकर लीला नहीं देखता। वह पात्रों के साथ चलता है, एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचता है, भीड़ का हिस्सा बनता है और पूरे माहौल को महसूस करता है। पीढ़ियों से जुड़े कलाकार, रामायणी दल, साधु-संत और श्रद्धालु मिलकर ऐसा वातावरण बनाते हैं जिसमें मंच और दर्शक के बीच की दूरी लगभग खत्म हो जाती है। यही वजह है कि रामनगर की रामलीला को केवल एक धार्मिक आयोजन के रूप में देखना इसके व्यापक स्वरूप को छोटा कर देना होगा। यह काशी की संस्कृति, परंपरा, लोक आस्था और सामूहिक भागीदारी की एक जीवंत तस्वीर भी है।

यूनेस्को से मिली वैश्विक पहचान

रामनगर की रामलीला को यूनेस्को की Intangible Cultural Heritage से जुड़ी वैश्विक पहचान प्राप्त है। इसकी परंपरा, मौलिक मंचन शैली, सामुदायिक भागीदारी और पीढ़ियों से चली आ रही सांस्कृतिक विरासत इसे विशेष बनाती है। करीब दो सौ वर्षों से चली आ रही यह परंपरा आज भी आधुनिक समय के बीच अपनी मूल पहचान को बनाए हुए है। शायद यही इसकी सबसे बड़ी कहानी है समय बदलता गया, शहर बदलता गया, तकनीक बदलती गई, लेकिन रामनगर की रामलीला आज भी उसी श्रद्धा और परंपरा के साथ आगे बढ़ती रही।

"गंगा के उस पार जब रामकथा शुरू होती है, तो रामनगर सिर्फ एक शहर नहीं रहता वह कुछ दिनों के लिए अयोध्या, जनकपुर, चित्रकूट और लंका की एक जीवंत यात्रा बन जाता है।" - निर्भीक लेखिका अनुष्का